Mumbai: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में गूगल को बड़ी राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी ऑनलाइन कंटेंट को हटाने या बैन करने का आदेश मजिस्ट्रेट कोर्ट नहीं दे सकता। न्यायमूर्ति निजामुद्दीन जमादार की एकल-न्यायाधीश पीठ ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम के तहत यह शक्ति मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती। हाई कोर्ट ने ऐसे आदेशों को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।
क्या है पूरा मामला
पशु कल्याण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था ‘ध्यान फाउंडेशन’ ने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। संस्था की मांग थी कि गूगल पशुओं के प्रति क्रूरता दिखाने वाले पांच आपत्तिजनक वीडियो तत्काल अपने प्लेटफॉर्म से हटाए। इससे पहले ध्यान फाउंडेशन ने मुंबई मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में याचिका दायर की थी, जहां कोर्ट ने गूगल के खिलाफ आदेश पारित करते हुए संबंधित कंटेंट का प्रसारण रोकने और उसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से हटाने के निर्देश दिए थे।
गूगल द्वारा आदेशों का पालन न किए जाने पर ध्यान फाउंडेशन ने अवमानना याचिका दायर की। इसके बाद गूगल ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेशों को मुंबई सेशंस कोर्ट में चुनौती दी। सेशंस कोर्ट में गूगल ने 116 दिनों तक आदेशों का पालन न कर पाने पर खेद व्यक्त किया, जिसके बाद कोर्ट ने अवमानना की कार्यवाही पर रोक लगा दी। इस रोक को ध्यान फाउंडेशन ने बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी।
गूगल की दलील
गूगल ने अदालत के समक्ष दलील दी कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69(ए) के अनुसार, ऑनलाइन किसी भी कंटेंट को हटाने, बैन करने या ब्लॉक करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारियों को है। साथ ही, ऐसे किसी भी आदेश में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित कंटेंट देश की संप्रभुता, अखंडता या सुरक्षा के लिए किस प्रकार खतरा है। गूगल ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट को ऐसा आदेश जारी करने का अधिकार नहीं है।
कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि किसी सार्वजनिक मंच से कंटेंट हटाने का आदेश देते समय दोनों पक्षों के मौलिक अधिकारों पर विचार किया जाना आवश्यक है। भारतीय संविधान सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसे बिना उचित प्रक्रिया के सीमित नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीधे तौर पर ऑनलाइन कंटेंट को बैन करना न केवल कंटेंट निर्माता बल्कि उसे देखने या पढ़ने वाले लोगों के मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन है। इसलिए मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेशों पर सेशंस कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक सही है।
सेशंस कोर्ट का फैसला बरकरार
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने सेशंस कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और गूगल को राहत दी। इस फैसले को ऑनलाइन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के अधिकारों के लिहाज से एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
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